इस वेब साइट को “कविकुल” जैसा सार्थक नाम दे कर निर्मित करने का प्रमुख उद्देश्य हिन्दी भाषा के कवियों को  एक सशक्त मंच उपलब्ध कराना है जहाँ वे अपनी रचनाओं को प्रकाशित कर सकें उन रचनाओं की उचित समीक्षा हो सके, साथ में सही मार्ग दर्शन हो सके और प्रोत्साहन मिल सके।

यह “कविकुल” वेब साइट उन सभी हिन्दी भाषा के कवियों को समर्पित है जो हिन्दी को उच्चतम शिखर पर पहुँचाने के लिये जी जान से लगे हुये हैं जिसकी वह पूर्ण अधिकारिणी है। आप सभी का इस नयी वेब साइट “कविकुल” में हृदय की गहराइयों से स्वागत है।

“यहाँ काव्य की रोज बरसात होगी।
कहीं भी न ऐसी करामात होगी।
नहाओ सभी दोस्तो खुल के इसमें।
बड़ी इससे क्या और सौगात होगी।।”

घनश्याम छंद “दाम्पत्य सुख”

घनश्याम छंद विधान –
“जजाभभभाग”, में यति छै, दश वर्ण रखो।
रचो ‘घनश्याम’, छंद अतीव ललाम चखो।।

“जजाभभभाग” = जगण जगण भगण भगण भगण गुरु।

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महाश्रृंगार छंद ‘चुनावी हल्ला’

महाश्रृंगार छंद 32 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जो 16 16 मात्रा के दो यति खण्ड में विभक्त रहता है। 16 मात्रा के यति खण्ड की मात्रा बाँट ठीक श्रृंगार छंद वाली है, जो 3 – 2 – 8 – 21(ताल) है।

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रथोद्धता छंद “आह्वाहन”

रथोद्धता छंद विधान –
“रानरा लघु गुरौ” ‘रथोद्धता’।
तीन वा चतुस तोड़ के सजा।

“रानरा लघु गुरौ” = 212 111 212 12

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रुचिरा छंद ‘भाभी’

रुचिरा छंद 30 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है।प्रत्येक पद 14,16 मात्राओं के दो यति खंडों में विभाजित रहता है।
इसका मात्रा विन्यास निम्न है-
अठकल + छक्कल, गुरु + अठकल + छक्कल
2222 222, 2 2222 222(S)

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गजपति छंद “नव उड़ान”

गजपति छंद विधान –

“नभलगा” गण रखो।
‘गजपतिम्’ रस चखो।।

“नभलगा” नगण  भगण लघु गुरु
( 111   211  1 2)

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कर्ण छंद ‘नववर्ष उल्लास’

कर्ण छंद 30 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। चार पदों के इस छंद में चारों या दो दो पद समतुकांत होते हैं।

इसका मात्रा विन्यास निम्न है-
2 2222 21, 12221 122 22 (SS)

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विधाता छंद “नव वर्ष”

विधाता छंद 28 मात्रा प्रति पद का सम पद मात्रिक छंद है जो 14 – 14 मात्रा के दो यति खंडों में विभक्त रहता है।

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शोकहर छंद ‘बेटी’

शोकहर छंद 30 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है। इसका मात्रा विन्यास निम्न है-
2222, 2222, 2222, 222 (S)
8+8+8+6 = 30 मात्रा।

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शालिनी छन्द
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

शालिनी छंद “राम स्तवन”

शालिनी छंद विधान –
राचें बैठा, सूत्र “मातातगागा”।
गावें प्यारी, ‘शालिनी’ छंद रागा।।

“मातातगागा”= मगण, तगण, तगण, गुरु, गुरु
(222 221 221 22)

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