कण्ठी छंद

“सवेरा”

हुआ सवेरा।
मिटा अँधेरा।।
सुषुप्त जागो।
खुमार त्यागो।।

सराहना की।
बड़प्पना की।।
न आस राखो।
सुशान्ति चाखो।।

करो भलाई।
यही कमाई।।
सदैव संगी।
कभी न तंगी।।

कुपंथ चालो।
विपत्ति पालो।।
सुपंथ धारो।
कभी न हारो।।
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यशोदा छंद विधान – (वर्णिक छंद परिभाषा)

विधान –

रखो “जगोगा” ।
रचो ‘यशोदा’।।

“जगोगा” = जगण, गुरु गुरु
121 2 2= 5 वर्ण की वर्णिक छंद।
4  चरण, 2-2 या चारों चरण समतुकांत।

“कण्ठी छंद” के नाम से भी यह छंद जानी जाती है, जिसका सूत्र –

कण्ठी छंद विधान –

“जगाग” वर्णी।
सु-छंद ‘कण्ठी’।।
“जगाग” = जगण गुरु गुरु (121 2 2)

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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

6 Responses

  1. अदरनीय
    आप कविता ऐसे लिखते हैं जैसे ये शब्द आपके कविता के लिए ही बने हो ।
    “सवेरा “कविता पढ़ने और उसके भाव पर अमल करने से सच में मन में एक नया सवेरा हो सकता है।
    शुभ संध्या।

  2. नवजागरण, जीवन में आगे बढने की सीख देती सुंदर रचना।

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