कुण्डलिया छंद, ‘गंगा मैया’

गंगा मैया आपकी,शरण पड़े नर नार।
पावन मन निर्मल करो, काटो द्वेष विकार।।
काटो द्वेष विकार, प्रेम की अलख जगादो।
करो पाप संहार, हमें भवपार लगा दो।।
मैल हृदय का धोय, करो माँ मन को चंगा।
विनती बारम्बार,जगत जननी माँ गंगा।।

लिंक :- कुण्डलिया छंद विधान

शुचिता अग्रवाल ‘शुचिसंदीप’

तिनसुकिया, असम

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