दीप छंद, ‘सर्दी’
दीप छंद, “सर्दी” चाहूँ गरम चाय, मौसम गजब ढाय। बरसे बहुत मेह, काँपे सकल देह।। सर्दी बहुत आज, करने सकल काज। कितनी कड़क भोर, दिन में तमस घोर।। कड़के गरज व्योम, अकड़े सकल रोम। कम्बल
दीप छंद, “सर्दी” चाहूँ गरम चाय, मौसम गजब ढाय। बरसे बहुत मेह, काँपे सकल देह।। सर्दी बहुत आज, करने सकल काज। कितनी कड़क भोर, दिन में तमस घोर।। कड़के गरज व्योम, अकड़े सकल रोम। कम्बल
दीप छंद विधान –
“चौकल नगण व्याप्त,
गुरु-लघु कर समाप्त,
रच लो मधुर ‘दीप’,
लगती चपल सीप।”
चौकल, नगण(111) गुरु लघु (S1) = 10 मात्रायें।

नाम– बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
निवास स्थान – तिनसुकिया (असम)
रुचि – काव्य की हर विधा में सृजन करना। हिन्दी साहित्य की हर प्रचलित छंद, गीत, नवगीत, हाइकु, सेदोका, वर्ण पिरामिड, गज़ल, मुक्तक, सवैया, घनाक्षरी इत्यादि। हिंदी साहित्य की पारंपरिक छंदों में विशेष रुचि है और मात्रिक एवं वर्णिक लगभग सभी प्रचलित छंदों में काव्य सृजन में सतत संलग्न।
सम्मान– मेरी रचनाएँ देश की सम्मानित वेब पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े विभिन्न ग्रूप और संस्थानों से कई अलंकरण और प्रसस्ति पत्र नियमित प्राप्त होते रहते हैं।