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Category: दीप छंद

दीप छंद, ‘सर्दी’

दीप छंद, “सर्दी” चाहूँ गरम चाय, मौसम गजब ढाय। बरसे बहुत मेह, काँपे सकल देह।। सर्दी बहुत आज, करने सकल काज। कितनी कड़क भोर, दिन में तमस घोर।। कड़के गरज व्योम, अकड़े सकल रोम। कम्बल

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दीप छंद “राम-भजन”

दीप छंद विधान –

“चौकल नगण व्याप्त,
गुरु-लघु कर समाप्त,
रच लो मधुर ‘दीप’,
लगती चपल सीप।”

चौकल, नगण(111) गुरु लघु (S1) = 10 मात्रायें।

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