जनहरण घनाक्षरी

“ब्रज-छवि”

मधुवन महकत, शुक पिक चहकत,
जन-मन हरषत, मधु रस बरसे।

कलि कलि सुरभित, गलि गलि मुखरित,
उपवन पुलकित, कण-कण सरसे।

तृषित हृदय यह, प्रभु-छवि बिन दह,
दरश-तड़प सह, निशि दिन तरसे।

यमुन-पुलिन पर, चित रख नटवर,
‘नमन’ नवत-सर, ब्रज-रज परसे।।

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जनहरण घनाक्षरी विधान :- घनाक्षरी विवेचन

चार पदों के इस छन्द में प्रत्येक पद में कुल वर्ण संख्या 31 होती है। इसमें पद के प्रथम 30 वर्ण लघु रहते हैं तथा केवल पदान्त दीर्घ रहता है। घनाक्षरी एक वर्णिक छंद है अतः वर्णों की संख्या 31 वर्ण से न्यूनाधिक नहीं हो सकती। चारों पदों में समतुकांतता होनी आवश्यक है। 31 वर्ण लंबे पद में 16, 15 पर यति रखना अनिवार्य है।

परन्तु देखा गया है कि 8,8,8,7 के क्रम में यति रखने से वाचन में सहजता और अतिरिक्त निखार अवश्य आता है, पर ये विधानानुसार आवश्यक भी नहीं है।

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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

6 Responses

  1. जनहरण घनाक्षरी जिसमें कि शुरू के 30 वर्ण लघु रहते हैं, उसमें भी अन्तर्यति तुकांतता को रखकर भावों को पूर्णतः संजोए रखना अति कठिन है। आपकी प्रभुद्ध,सिद्धहस्त लेखनी को प्रणाम।
    माँ शारदे की कृपा हमेशा आप पर बनी रहे,यही कामना है।

  2. इस कठिन विधान में इतनी प्यारी घनाक्षरी में अद्भुत ब्रज की छटा का वर्णन किया है आपने।

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