तिलका छंद

“युद्ध”

गज अश्व सजे।
रण-भेरि बजे।।
रथ गर्ज हिले।
सब वीर खिले।।

ध्वज को फहरा।
रथ रौंद धरा।।
बढ़ते जब ही।
सिमटे सब ही।।

बरछे गरजे।
सब ही लरजे।।
जब बाण चले।
धरणी दहले।।

नभ नाद छुवा।
रण घोर हुवा।
रज खूब उड़े।
घन ज्यों उमड़े।।

तलवार चली।
धरती बदली।।
लहु धार बही।
भइ लाल मही।।

कट मुंड गए।
सब त्रस्त भए।।
धड़ नाच रहे।
अब हाथ गहे।।

शिव तांडव सा।
खलु दानव सा।।
यह युद्ध चला।
सब ही बदला।।

जब शाम ढ़ली।
चँडिका हँस ली।।
यह युद्ध रुका।
सब जाय चुका।।
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तिलका छंद विधान – लिंक –> वर्णिक छंद परिभाषा

“सस” वर्ण धरे।
‘तिलका’ उभरे।।

“सस” = सगण सगण
(112 112),
दो-दो चरण तुकांत (6वर्ण प्रति चरण )
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

8 Responses

  1. वर्णिक अति लघु रूपधारी तिलका छंद में युद्ध के अति विस्तृत भावों का समावेश करते हुए आपने जो वर्णन किया है वह अतुलनीय एवं अद्भुत है। युद्ध के दृश्य को सांगोपांग शब्दों से उकेर दिया है।
    इस रचना की आपको ढेरों बधाइयां देती हूँ। हमारे समृद्ध हिंदी साहित्य एवं आप सरीखे रचनाकारों पर गर्व होता है ऐसी रचनाएँ पढ़कर।

    “कहती बहना
    लिखते रहना
    रवि से दमको
    जग में चमको”

    1. शुचिता बहन तुम्हारी हृदय खिलाती मोहक प्रतिक्रिया का हृदयतल से धन्यवाद।
      कवि के कुल की।
      नित ही पुलकी।
      शुचिता बहना।
      तुम हो गहना।।

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