सवैया छंद
तुम हंस सुशोभित हो कर माँ, प्रगटो वर सेवक माँगत है।।

दुर्मिल सवैया “शारदा वंदन”

शुभ पुस्तक हस्त सदा सजती, कमलासन श्वेत बिराजत है।
मुख मण्डल तेज सुशोभित है, वर वीण सदा कर साजत है।
नर-नार बसन्तिय पंचम को, सब शारद पूजत ध्यावत है।
तुम हंस सुशोभित हो कर माँ, प्रगटो वर सेवक माँगत है।।

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दुर्मिल सवैया विधान – (वर्णिक छंद परिभाषा)

यह 24 वर्ण प्रति चरण का एक सम वर्ण वृत्त है। अन्य सभी सवैया छंदों की तरह इसकी रचना भी चार चरण में होती है और सभी चारों चरण एक ही तुकांतता के होने आवश्यक हैं।

यह सवैया सगण (112) पर आश्रित है, जिसकी 8 आवृत्ति प्रति चरण में रहती है। इसकी संरचना लघु लघु गूरु × 8 है।

(112 112 112 112 112 112 112 112)

सवैया छंद यति बंधनों में बंधे हुये नहीं होते हैं परंतु दुर्मिल के चरण में 12 – 12 वर्ण के 2 यति खंड रखने से लय की सुगमता रहती है। क्योंकि यह एक वर्णिक छंद है अतः इसमें गुरु के स्थान पर दो लघु वर्ण का प्रयोग करना अमान्य है।

सवैया छंद विधान (क्लिक करके देखें)

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

8 Responses

    1. आदरणीय नवल किशोर जी आपका कविकुल में स्वागत है। यह वेब साइट हिन्दी छंदों को समर्पित है। यहाँ आपको छंदों की विस्तृत जानकारी मिलेगी। और रचनाओं पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करेंं।

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