नील छंद “विरहणी”

वे मन-भावन प्रीत लगा कर छोड़ चले।
खावन दौड़त रात भयानक आग जले।।
पावन सावन बीत गया अब हाय सखी।
आवन की धुन में उन के मन धीर रखी।।

वर्षण स्वाति लखै जिमि चातक धीर धरे।
त्यों मन व्याकुल साजन आ कब पीर हरे।।
आकुल भू कब अंबर से जल धार बहे।
ये मन आतुर हो पिय का वनवास सहे।।

मोर चकोर अकारण शोर मचावत है।
बागन की छवि जी अब और जलावत है।।
ये बरषा विरहानल को भड़कावत है।
गीत नये उनके मन को न सुहावत है।।

कोयल कूक लगे अब वायस काँव मुझे।
पावस के इस मौसम से नहिं प्यास बुझे।।
और बिछोह बचा कितना अब शेष पिया।
नेह-तृषा अब शांत करो लगता न जिया।।
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नील छंद विधान – (वर्णिक छंद परिभाषा)

“भा” गण पांच रखें इक साथ व “गा” तब दें।
‘नील’ सुछंदजु षोडस आखर की रच लें।।

“भा” गण पांच रखें इक साथ व “गा”= 5 भगण+गुरु

(211×5+गुरु) = 16वर्ण की वर्णिक छंद।
चार चरण, दो दो या चारों चरण समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

6 Responses

  1. नील छंद में बहुत ही मनभावन रचना हुई है।

  2. अद्भुत छंद व भाव भरा नवगान हुआ
    नील सुछंद स्वरूप सदा सनमान हुआ।
    क्या कहने, वसुदेव सदा शुभ छंद कहो
    वृष्टि रसान्वित से बस आप सुधार बहो।।

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