पुटभेद छंद

“बसंत-छटा”

छा गये ऋतुराज बसंत बड़े मन-भावने।
दृश्य आज लगे अति मोहक नैन सुहावने।
आम्र-कुंज हरे चित, बौर लदी हर डाल है।
कोयली मधु राग सुने मन होत रसाल है।।

रक्त-पुष्प लदी टहनी सब आज पलास की।
सूचना जिमि देवत आवन की मधुमास की।।
चाव से परिपूर्ण छटा मनमोहक फाग की।
चंग थाप कहीं पर, गूँज कहीं रस राग की।।

ठंड से भरपूर अभी तक मोहक रात है।
शीत से सित ये पुरवा सिहरावत गात है।।
प्रेम-चाह जगा कर व्याकुल ये उसको करे।
दूर प्रीतम से रह आह भयावह जो भरे।।

काम के सर से लगते सब घायल आज हैं।
देखिये जिस और वहाँ पर ये मधु साज हैं।।
की प्रदान नवीन उमंग तरंग बसंत ने।
दे दिये नव भाव उछाव सभी ऋतु-कंत ने।।
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पुटभेद छंद विधान – (वर्णिक छंद परिभाषा)

“राससाससुलाग” सुछंद रचें अति पावनी।
वर्ण सप्त दशी ‘पुटभेद’ बड़ी मन भावनी।।

“राससाससुलाग” = रगण सगण सगण सगण सगण लघु गुरु।

(212  112  112   112  112  1 2)
17 वर्ण प्रति चरण,
4 चरण,2-2 चरण समतुकान्त।
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

6 Responses

  1. पुटभेद छंद में बसंत ऋतु का अत्यंत मोहक रूप में वर्णन हुआ है। बहुत ही प्यारी रचना।

  2. ऋतुराज बसंत आगमन के मनोरम दृश्यों को पुटभेद वर्णिक छंद में आपने अंकित किया है जो कि एक कवि के लिए बहुत कठिन होता है। वर्णिक छंद माला में भावों को मोतियों की तरह पिरोना तो कोई आपसे सीखे।
    नमन आपकी प्रबुद्ध लेखनी को।

    1. शुचिता बहन तुम्हारी उत्साह वर्धन करनेवाली टिप्पणियाँ हृदय का तार तार खिला देती है। ऐसी टिप्पणियों पर मैं अपना आत्मिक धन्यवाद व्यक्त करता हूँ।

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