मंदाक्रान्ता छंद

विषय-जागो-जागो

सिद्धा वाणी,सरस रहती,दूर होता अँधेरा।
त्यागो आपा,मन वचन से,प्राप्त हो सिद्ध डेरा।।
कल्याणी है,वचन सब ये,वेद सारे बताते।
मिथ्या गाने,दुखद जग के,लोग गा-गा सुनाते।।

सारे भोगी,जन जगत के,लोभ में मान खोते।
धारा में हो,विवश बहते,अश्रु ही अश्रु रोते।।
अज्ञानी हैं,नमन करना,दूर से पाँव छूना।
लूले हैं ये,डगर चलते,घाव दें नित्य दूना।।

इच्छा त्यागो,इस जगत की,प्रेम में जाग जाओ।
रोता देखे,जगत हँसता,प्रेम के गीत गाओ।
जागो-जागो,जगत भ्रम है,राम साथी तुम्हारे।
गाओ गाने,सुमन मन से,राम के ही सहारे।।

वाणी बोलो,सुनकर जिसे,काल भी जाग जाए।
आगे आओ,सुरभि जग के,नाम बाँटो सुहाए।।
आभा फैले,धरणि तल में,गान पंछी सुनाएँ।
प्रातः जागे,सब जन जगें,सौख्य का सार पाएँ।।

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मंदाक्रान्ता छंद विधान के लिए:- लिंक

बाबा कल्पनेश
श्री गीता कुटीर-12,गंगा लाइन, स्वर्गाश्रम-ऋषिकेश,पिन-249304

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