मनहरण घनाक्षरी, ‘कविकुल’

कविकुल निखरा है,
काव्य-रस बिखरा है,
रसपान करने को,
कविगण आइये।

प्रेम का ये अनुबंध,
अतिप्रिय है सम्बंध,
भावों से पिरोये छन्द,
मंत्रमुग्ध गाईये।

काव्य कुंज ये है प्यारा,
भरे मन उजियारा,
छंदों का निराला स्वाद,
नित नया पाइये।

भावों के हैं विज्ञ सभी,
पर हित सब लोभी,
‘शुचि’ सुरसरि माँहीं,
गोता तो लगाइये।

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मनहरण घनाक्षरी विधान-

मनहरण घनाक्षरी चार पदों का वर्णिक छन्द है।प्रत्येक पद में कुल वर्ण संख्या 31 होती है। वर्णों की संख्या 31 वर्ण से न्यूनाधिक नहीं हो सकती। चारों पदों में समतुकांतता होनी आवश्यक है। 31 वर्ण लंबे पद में 16, 15 पर यति रखना अनिवार्य है। पदान्त हमेशा दीर्घ वर्ण ही रहता है।
8,8,8,7 के क्रम में यति तथा पदान्त लघु-गुरु(12) रखने से वाचन में सहजता और अतिरिक्त निखार अवश्य आता है,परन्तु ये दोनों ही बातें विधानानुसार आवश्यक नहीं है।

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शुचिता अग्रवाल’शुचिसंदीप’
तिनसुकिया, असम

4 Responses

  1. कविकुल के महत्व को दर्शाती सुंदर कविता।

  2. कविकुल अच्छी site लगी। मज़ा आ रहा है। ☺

  3. वाह शुचि बहन कविकुल वेब साइट पर साहित्यकारों का आह्वान करती मधुर घनाक्षरी।

    “कविकुल निखरा है,
    काव्य-रस बिखरा है,
    रसपान करने को,
    कविगण आइये।”

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