रथोद्धता छंद

“आह्वाहन”

मात अम्ब सम रूप राख के।
देश-भक्ति रस भंग चाख के।
गर्ज सिंह सम वीर जागिये।
दे दहाड़ अब नींद त्यागिये।।

आज है दुखित मात भारती।
आर्त होय सबको पुकारती।।
वीर जाग अब आप जाइये।
धूम शत्रु-घर में मचाइये।।

देश का हित कभी न शीर्ण हो।
भाव ये हृदय से न जीर्ण हो।।
ये विचार रख के बढ़े चलो।
ही किसी न अवरोध से टलो।।

रौद्र रूप अब वीर धारिये।
मातृ भूमि पर प्राण वारिये।
अस्त्र शस्त्र कर धार लीजिये।
मुंड काट रिपु ध्वस्त कीजिये।।
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रथोद्धता छंद विधान – वर्णिक छंद परिभाषा   <– लिंक

“रानरा लघु गुरौ” ‘रथोद्धता’।
तीन वा चतुस तोड़ के सजा।

“रानरा लघु गुरौ” = 212 111 212 12

रथोद्धता छंद ११ वर्ण प्रति चरण की चतुष्पदी वर्णिक छंद है। हर चरण में तीसरे या चौथे वर्ण के बाद यति होती है।
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

4 Responses

  1. ओजपूर्ण ,देशभक्ति की हुंकार भरती वीर रस पर सराहनीय सृजन।

  2. वीर रस से परिपूर्ण जवानों का आह्वान करती रचना।

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