रास छंद

“कृष्णावतार”

हाथों में थी, मात पिता के, सांकलियाँ।
घोर घटा में, कड़क रहीं थी, दामिनियाँ।
हाथ हाथ को, भी नहिं सूझे, तम गहरा।
दरवाजों पर, लटके ताले, था पहरा।।

यमुना मैया, भी ऐसे में, उफन पड़ी।
विपदाओं की, एक साथ में, घोर घड़ी।
मास भाद्रपद, कृष्ण पक्ष की, तिथि अठिया।
कारा-गृह में, जन्म लिया था, मझ रतिया।।

घोर परीक्षा, पहले लेते, साँवरिया।
जग को करते, एक बार तो, बावरिया।
सीख छिपी है, हर विपदा में, धीर रहो।
दर्शन चाहो, प्रभु के तो हँस, कष्ट सहो।।

अर्जुन से बन, जीवन रथ का, स्वाद चखो।
कृष्ण सारथी, रथ हाँकेंगे, ठान रखो।
श्याम बिहारी, जब आते हैं, सब सुख हैं।
कृष्ण नाम से, सारे मिटते, भव-दुख हैं।।
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रास छंद विधान – (मात्रिक छंद परिभाषा)

रास छंद 22 मात्राओं का सम पद मात्रिक छंद है जिसमें 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। पदान्त 112 से होना आवश्यक है। चार पदों का एक छंद होता है जिसमें 2-2 पद सम तुकांत होने चाहिये। मात्रा बाँट प्रथम और द्वितीय यति में एक अठकल या 2 चौकल की है। अंतिम यति में 2 – 1 – 1 – 2(ऽ) की है।
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

5 Responses

  1. प्रिय नमन जी
    सादर नमन।
    मुम्बई से प्रकाशित हो रही उत्कृष्ट अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘कृष्ण प्रज्ञा’ के बसंत अंक हेतु कृष्ण और बसंत पर केंद्रित काव्य रचना अपने चित्र, डाक पता, ईमेल वॉट्सऐपक्रमांक सहित तुरंत 9425183244 पर वॉट्सऐप कीजिए। समीक्षा हेतु अपनी पुस्तकें भेज सकते हैं।
    आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’
    साहित्य संपादक कृष्ण प्रज्ञा
    ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन जबलपुर ४८२००१
    salil.sanjiv@gmail.com, 9425183244

  2. भगवान कृष्ण के जन्म की समस्त परिस्थितियों का सांगोपांग लेखन किया है आपने। इस दिव्य झाँकी को रास छंद के माध्यम से बहुत ही सुंदर प्रस्तुत किया है।
    अद्भुत लेखन।

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