वागीश्वरी सवैया

“दया”

दया का महामन्त्र धारो मनों में, दया से सभी को लुभाते चलो।
न हो भेद दुर्भाव कैसा किसी से, सभी को गले से लगाते चलो।
दयाभूषणों से सभी प्राणियों के, उरों को सदा ही सजाते चलो।
सताओ न थोड़ा किसी जीव को भी, दया की सुधा को बहाते चलो।
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वागीश्वरी सवैया विधान – (सवैया छंद विधान) <– लिंक

यह 23 वर्ण प्रति चरण का एक सम वर्ण वृत्त है। अन्य सभी सवैया छंदों की तरह इसकी रचना भी चार चरण में होती है और सभी चारों चरण एक ही तुकांतता के होने आवश्यक हैं।

यह सवैया यगण (122) पर आश्रित है, जिसकी 7 आवृत्ति तथा चरण के अंतमें लघु गुरु वर्ण जुड़ने से होती है। इसका संरचना लघु गुरु गुरु × 7 + लघु गुरु है।
(122 122 122 122 122 122 122 12)

सवैया छंद यति बंधनों में बंधे हुये नहीं होते हैं। फिर भी इसके चरण में 12 – 11 वर्ण के 2 यति खंड रखने से लय की सुगमता रहती है। क्योंकि यह एक वर्णिक छंद है अतः इसमें गुरु के स्थान पर दो लघु वर्ण का प्रयोग करना अमान्य है।
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

4 Responses

  1. वागीश्वरी सवैया छंद की विस्तृत जानकारी आपने कविकुल पर प्रेषित की है जो कि हमारे लिए बहुत ही लाभदायक है। प्रत्येक छंद के विधान को आप इतनी बारीकी से लिखते हो कि शंका की कोई गुंजाइश बाकी ही नहीं रह जाती है।
    दया के मूलमंत्र को बखूबी आपने सवैया छंद में पिरोया है।
    अति सुंदर।

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