सुगीतिका छंद,

‘मेरे लाल’

लिये खड़ी शुभकामना का, मैं सजाकर थाल।
घड़ी-घड़ी आशीष दूँ यह, तू जिये सौ साल।।
निहाल हूँ पाकर तुम्हे मैं, इस जनम में लाल।
न आँच तुम पर आ सकेगी, हूँ तुम्हारी ढाल।।

तुम्हे बधाई जन्मदिन की, स्वप्न हो साकार।
मिले तुम्हें ऐश्वर्य, खुशियाँ, प्रेम का उपहार।।
नवीन ऊर्जा, स्वस्थ काया, सूर्य सा हो तेज।
सदैव फूलों सी महकती, हो तुम्हारी सेज।।

जड़ें प्रतिष्ठा की बढ़े पर, हो नियत अति नेक।
हृदय सुसेवा, शौर्य जागे, सुप्त हो अविवेक।।
उमंग नित परमार्थ की हो, प्रेरणा हो पास।
भरा रखो हर क्षेत्र में तुम, कार्य का उल्लास।।

रहे बरसती प्रभु कृपा नित, शुद्ध हो आचार।
भरा रहे भंडार धन का, लक्ष्य हो उपकार।।
हँसो हँसाओ प्रेम बाँटो, उच्च यह व्यवहार।
सदा पनपते ही रहे ‘शुचि’, श्रेष्ठ अति सुविचार।।
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सुगीतिका छंद विधान-

सुगीतिका छंद 25 मात्राओं का समपद मात्रिक छंद है जो 15-10 मात्राओं के दो यति खण्ड में विभक्त रहता है।
इसका मात्रा विन्यास निम्न है-

1 2122*2, 2122 21 = (सुगीतिका) = 15+10 = 25 मात्रायें।

दो दो या चारों पद समतुकांत होते हैं।

चूंकि यह मात्रिक छंद है अतः 2 को 11 में तोड़ा जा सकता है।

मात्रिक छंद परिभाषा
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शुचिता अग्रवाल ‘शुचिसंदीप’
तिनसुकिया, असम

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