सुमति छंद

“भारत देश”

प्रखर भाल पे हिमगिरि न्यारा।
बहत वक्ष पे सुरसरि धारा।।
पद पखारता जलनिधि खारा।
अनुपमेय भारत यह प्यारा।।

यह अनेकता बहुत दिखाये।
पर समानता सकल बसाये।।
विषम रीत हैं अरु पहनावा।
सकल एक हों जब सु-उछावा।।

विविध धर्म हैं, अगणित भाषा।
पर समस्त की यक अभिलाषा।।
प्रगति देश ये कर दिखलाए।
सकल विश्व का गुरु बन छाए।।

हम विकास के पथ-अनुगामी।
सघन राष्ट्र के नित हित-कामी।।
‘नमन’ देश को शत शत देते।
प्रगति-वाद के परम चहेते।।
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सुमति छंद विधान – <– लिंक (वर्णिक छंद परिभाषा)

गण “नरानया” जब सज जाते।
‘सुमति’ छंद की लय बिखराते।।

“नरानया” = नगण रगण नगण यगण
(111 212 111 122)
12 वर्ण प्रति चरण का वर्णिक छंद, 4 चरण दो दो सम तुकान्त।
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

4 Responses

  1. भारत देश की अक्षुण्ण परंपराओं का बखान करती अति सुंदर रचना।

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