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ताटंक छंद ‘भँवर’

ताटंक छंद (गीत) ‘भँवर’ बीच भँवर में अटकी नैया, मंजिल छू ना पाई है। राहों में अपने दलदल की, खोदी मैंने खाई है।। कच्ची माटी के ढेले सा, मन कोमल सा मेरा था। जिधर मिला बल उधर लुढ़कता, कहाँ स्वार्थ ने घेरा था।। पकते तन पर धीरे धीरे, मलिन परत चढ़ आयी है। बीच भँवर […]