भुजंगप्रयात छंद

“नोट बन्दी”

हुई नोट बन्दी ठगा सा जमाना।
किसी को रुलाना किसी को हँसाना।।
कहीं आँसुओं की झड़ी सी लगी है।
कहीं पे खुशी की दिवाली जगी है।।

इकट्ठा जिन्होंने किया वित्त काला।
उन्हीं का पिटा आज देखो दिवाला।।
बसी थी जहाँ अल्प ईमानदारी।
खरे लोग देखो सभी हैं सुखारी।।

कहीं नोट की लोग होली जलाते।
कहीं बन्द बोरे नदी में बहाते।।
किसी के जगे भाग खाते खुला के।
कराए जमा नोट काले धुला के।।

सभी बैंक में आ गई भीड़ सारी।
लगी हैं कतारें मचा शोर भारी।।
कमी नोट की सामने आ रही है।
नहीं जानते क्या हुआ ये सही है।।
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भुजंगप्रयात छंद विधान – (वर्णिक छंद परिभाषा)

4 यगण (122) यानी कुल 12 वर्ण प्रत्येक चरण की वर्णिक छंद। चार चरण दो दो समतुकांत।
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

4 Responses

  1. भुजंगपर्यात छंद में नोटबन्दी का बहुत ही सजीव चित्र उकेरा है। 2016 की वह रात जब अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने टी वी पर घोषणा की थी।
    सच, आपकी रचना पढ़कर सारा दृश्य आँखों के सामने आ गया।
    बढ़िया रचना,विषय भी हटके लिया है आपने।

  2. आपकी इस कविता ने 2016 के नवंबर में अचानक घोषित नोटबन्दी की याद ताजा कर दी। जीवंत वर्णन।

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