सूर घनाक्षरी

“विधा”

मिलते विषम दोय, सम-कल तब होय,
सम ही कवित्त को तो, देत बहाव है।

आदि न जगन रखें, लय लगातार लखें,
अंत्य अनुप्रास से ही, या का लुभाव है।

शब्द रखें भाव भरे, लय ऐसी मन हरे,
भरें अलंकार जा का, खूब प्रभाव है।

गाके देखें बार बार, अटकें न मझधार,
रचिए कवित्त जा से, भाव रिसाव है।।
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सूर घनाक्षरी विधान – लिंक –> (घनाक्षरी विवेचन)

चार पदों के इस छंद में प्रत्येक पद में कुल वर्ण संख्या 30 होती है। पद में 8, 8, 8, 6 वर्ण पर यति रखना अनिवार्य है। इस घनाक्षरी में चरणान्त की कोई बाध्यता नहीं, कुछ भी रख सकते हैं।

घनाक्षरी एक वर्णिक छंद है अतः सूर घनाक्षरी में वर्णों की संख्या प्रति पद 30 वर्ण से न्यूनाधिक नहीं हो सकती। चारों पदों में समतुकांतता निभानी आवश्यक है।
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बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

6 Responses

  1. सीताराम
    सूर घनाक्षरी का विधान सूर घनाक्षरी में ही पढ़ने को मिला।बहुत सुंदर विधान की अभिव्यक्ति है।नये-पुराने सभी के लिए यह लाभ प्रदान सिद्ध होगा।भूरिशः बधाई।

  2. सूर घनाक्षरी में ही किसी भी प्रकार की घनाक्षरी सृजन की सुंदर विवेचना।

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