सुगति छंद / शुभगति छंद

शांति धारो।
दुःख टारो।।
सदा सुखदा।
हरे विपदा।।

रस-खान है।
सुख पान है।।
यदि शांति है।
नहिँ भ्रांति है।।

कटुता हरे।
मृदुता भरे।।
नित सुहाती।
दिव्य थाती।।

ले सुस्तियाँ।
दे मस्तियाँ।।
सुख-सुप्ति दे।
तन-तृप्ति दे।।

शांति गर है।
सुघड़ घर है।।
रीत अपनी।
ताप हरनी।।

शांति मन की।
खान धन की।।
हर्ष दात्री।
‘नमन’ पात्री।।
***********

सुगति छंद / शुभगति छंद विधान –

सुगति छंद जो कि शुभगति छंद के नाम से भी जाना जाता है, 7 मात्रा प्रति चरण का सम मात्रिक छंद है जिसका अंत गुरु वर्ण (S) से होना आवश्यक है। यह लौकिक जाति का छंद है। एक छंद में कुल 4 चरण होते हैं और छंद के दो दो या चारों चरण सम तुकांत होने चाहिए। इन 7 मात्राओं का विन्यास पंचकल + गुरु वर्ण (S) है। पंचकल की निम्न संभावनाएँ हैं :-

122
212
221
(2 को 11 में तोड़ सकते हैं, पर अंत सदैव गुरु (S) से होना चाहिए।)

मात्रिक छंद परिभाषा
******************

बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’ ©
तिनसुकिया

4 Responses

  1. सुगति छंद में शांति के महत्व को दर्शाती उत्तम रचना।
    बहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति।
    आपकी रचनाओं में भावों की एकरूपता दिखती है जो कि लेखनी की सिद्धहस्तता को दर्शाती है। शब्द चयन हमेशा ही श्रेष्ठ लगते हैं।
    माँ सरस्वती की कृपा हमेशा आप पर रहे और आप निरन्तर नई रचनाएँ लिखते रहे यही कामना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.