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लावणी छंद (गीत)

‘दिल मेरा ही छला गया’

क्यूँ शब्दों के जादूगर से, दिल मेरा ही छला गया।
उमड़ घुमड़ बरसाया पानी, बादल था वो चला गया।।

तड़प रही थी एक बूंद को, सागर चलकर आया था।
प्यासे मन से ये मत पूछो, कितना तुमको भाया था।।
एक हृदय में आग धधकती, वो मेरे क्यूँ जला गया।
उमड़ घुमड़ बरसाया पानी, बादल था वो चला गया।।

तार जुड़े फिर गये टूट भी, गीत अधूरे मेरे हैं।
साँसों की सरगम में मेरे, सुर सारे ही तेरे हैं।।
सदा संग रहने की आशा, क्यों कर मन में फला गया।
उमड़ घुमड़ बरसाया पानी,बादल था वो चला गया।।

अक्सर ऐसा होते देखा, जो जाते कब आते हैं।
इंतजार में दिन कट जाते, आँख बरसती रातें हैं।।
छोड़ अधूरा जीवन मेरा, क्यों कर फिर वो भला गया।
उमड़ घुमड़ बरसाया पानी, बादल था वो चला गया।।

लावणी छंद विधान

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शुचिता अग्रवाल ‘शुचिसंदीप’

तिनसुकिया, असम

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