भुजंगप्रयात छंद “नोट बन्दी”
भुजंगप्रयात छंद विधान –
4 यगण (122) यानी कुल 12 वर्ण प्रत्येक चरण की वर्णिक छंद। चार चरण दो दो समतुकांत।
भुजंगप्रयात छंद विधान –
4 यगण (122) यानी कुल 12 वर्ण प्रत्येक चरण की वर्णिक छंद। चार चरण दो दो समतुकांत।
लावणी छंद “राधा-कृष्ण”
लता, फूल, रज के हर कण में, नभ से झाँक रहे घन में।
राधे-कृष्णा की छवि दिखती, वृन्दावन के निधिवन में।।
राधा-माधव युगल सलोने, निशदिन वहाँ विचरते हैं।
प्रेम सुधा बरसाने भू पर, लीलाएँ नित करते हैं।।
वसन्ततिलका छंद विधान –
“ताभाजजागगु” गणों पर वर्ण राखो।
प्यारी ‘वसन्ततिलका’ तब छंद चाखो।।
“ताभाजजागगु” = तगण, भगण, जगण, जगण और दो गुरु।
लीला छंद विधान –
लीला छंद बारह मात्रा प्रति पद का मात्रिक छंद है जिसका चरणान्त जगण (121) से होना अनिवार्य होता है।
इसका मात्रा विन्यास निम्न है-
अठकल + जगण(121) =12 मात्राएँ।
मुक्तामणि छंद विधान –
दोहे का लघु अंत जब, सजता गुरु हो कर के।
‘मुक्तामणि’ प्रगटे तभी, भावों माँहि उभर के।।
मुक्तामणि छंद चार पदों का 25 मात्रा प्रति पद का सम पद मात्रिक छंद है जो 13 और 12 मात्रा के दो यति खण्डों में विभाजित रहता है।
भक्ति छंद विधान –
“तायाग” सजी क्या है।
ये ‘भक्ति’ सुछंदा है।।
“तायाग” = तगण यगण, गुरु
हंसगति छंद विधान –
हंसगति छंद बीस मात्रा प्रति पद का मात्रिक छंद है जिसमें ग्यारहवीं और नवीं मात्रा पर विराम होता है। प्रथम चरण की मात्रा बाँट ठीक दोहे के सम चरण वाली तथा 9 मात्रिक द्वितीय चरण की मात्रा बाँट 3 + 2 + 4 है।
मालिनी छंद विधान –
“ननिमयय” गणों में, ‘मालिनी’ छंद जोड़ें।
यति अठ अरु सप्ता, वर्ण पे आप तोड़ें।।
“ननिमयय” = नगण, नगण, मगण, यगण, यगण।
111 111 22,2 122 122
शास्त्र छंद विधान –
शास्त्र छंद 1222 1222 1221 मापनी पर आधारित 20 मात्रा प्रति चरण का मात्रिक छंद है।
शार्दूलविक्रीडित छंद विधान –
“मैं साजूँ सतताग” वर्ण दश नौ, बारा व सप्ता यतिम्।
राचूँ छंद रसाल चार पद की, ‘शार्दूलविक्रीडितम्’।।
“मैं साजूँ सतताग” = मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण और गुरु।
222 112 121 112// 221 221 2
बिहारी छंद विधान –
यह (221 1221 12, 21 122) मापनी पर आधारित 22 मात्रा का मात्रिक छंद है।
यशोदा छंद विधान –
रखो “जगोगा” ।
रचो ‘यशोदा’।।
“जगोगा” = जगण, गुरु गुरु
121 2 2= 5 वर्ण की वर्णिक छंद।
शैलसुता छंद विधान –
शैलसुता छंद चार चरण का वर्णिक छंद होता है जिसमें दो- दो चरण समतुकांत होते हैं।
4 लघु + 6भगण (211)
+1 गुरु = 23 वर्ण
1111 + 211*6 + 2
रूपमाला छंद / मदन छंद विधान –
रूपमाला छंद जो कि मदन छंद के नाम से भी जाना जाता है, 24 मात्रा प्रति पद का सम-पद मात्रिक छंद है। इसके प्रत्येक पद में 14 और 10 के विश्राम से 24 मात्राएँ और पदान्त गुरु-लघु से होता है।
शक्ति छंद विधान –
यह (122 122 122 12) मापनी पर आधारित 18 मात्रा का मात्रिक छंद है। चूंकि यह एक मात्रिक छंद है अतः गुरु (2) वर्ण को दो लघु (11) में तोड़ने की छूट है।
उड़ियाना छंद विधान –
उड़ियाना छंद 22 मात्रा का सम मात्रिक छंद है। यह प्रति पद 22 मात्रा का छंद है। इस में 12,10 मात्रा पर यति विभाजन है। यति से पहले त्रिकल आवश्यक।
कुकुभ छंद विधान –
कुकुभ छंद सम-मात्रिक छंद है। इस चार पदों के छंद में प्रति पद 30 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पद 16 और 14 मात्रा के दो चरणों में बंटा हुआ रहता है। 14 मात्रिक चरण की अंतिम 4 मात्रा सदैव 2 गुरु (SS) होती हैं तथा बची हुई 10 मात्राएँ अठकल + द्विकल होती हैं।
जनहरण घनाक्षरी विधान :-
चार पदों के इस छन्द में प्रत्येक पद में कुल वर्ण संख्या 31 होती है। इसमें पद के प्रथम 30 वर्ण लघु रहते हैं तथा केवल पदान्त दीर्घ रहता है।
सिंहनाद छंद विधान –
“सजसाग” वर्ण दश राखो।
तब ‘सिंहनाद’ मधु चाखो।।
“सजसाग” = सगण जगण सगण गुरु।
गिरिधारी छंद विधान –
“सनयास” अगर तू सूत्र रखे।
तब छंदस ‘गिरिधारी’ हरखे।।
“सनयास” = सगण, नगण, यगण, सगण

नाम– बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
निवास स्थान – तिनसुकिया (असम)
रुचि – काव्य की हर विधा में सृजन करना। हिन्दी साहित्य की हर प्रचलित छंद, गीत, नवगीत, हाइकु, सेदोका, वर्ण पिरामिड, गज़ल, मुक्तक, सवैया, घनाक्षरी इत्यादि। हिंदी साहित्य की पारंपरिक छंदों में विशेष रुचि है और मात्रिक एवं वर्णिक लगभग सभी प्रचलित छंदों में काव्य सृजन में सतत संलग्न।
सम्मान– मेरी रचनाएँ देश की सम्मानित वेब पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े विभिन्न ग्रूप और संस्थानों से कई अलंकरण और प्रसस्ति पत्र नियमित प्राप्त होते रहते हैं।