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Category: छंद

चौपई छन्द

चौपई छन्द विधान – 

चौपई एक मात्रिक छन्द है। इस छन्द में चार चरण होते हैं। चौपई छन्द से मिलते-जुलते नाम वाले अत्यंत ही प्रसिद्ध सममात्रिक छन्द चौपाई से भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये। चौपई के प्रत्येक चरण में 15 मात्राओं के साथ ही प्रत्येक चरण में समापन एक गुरु एवं एक लघु के संयोग से होता है।

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सवैया छंद विधान

सवैया छंद विधान –

सवैया चार चरणों का वर्णिक छंद है जिसके प्रति चरण में 22 से 26 तक वर्ण रहते हैं। चारों चरण समतुकांत होते हैं। सवैया किसी गण पर आश्रित होता है जिसकी 7 या 8 आवृत्ति रहती है।

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छंद परिभाषा

छंद परिभाषा :-

मात्रा या वर्ण की निश्चित संख्या, ह्रस्व स्वर और दीर्घ स्वर की विभिन्न आवृत्ति, मात्रा बाँट, यति, गति तथा अन्त्यानुप्रास के नियमों में आबद्ध पद्यात्मक इकाई छंद कहलाती है।

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वाचिक स्वरूप

वाचिक स्वरूप :-

वर्तमान में हिंदी में वाचिक स्वरूप में सृजन करने का प्रचलन तेजी से बढ़ता जा रहा है। वाचिक का स्वरूप तो वर्णिक है पर इसके सृजन में न तो वर्णों की संख्या का बंधन है और न ही मात्राओं का। इसमें उच्चारण की प्रमुखता है और इस आधार पर गुरु को दो लघु में भी तोड़ा जा सकता है और कहीं कहीं गुरु वर्ण को लघु रूप में भी लिया जा सकता है।

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वर्णिक छंद परिभाषा

वर्णिक छंद परिभाषा

वर्णिक छंद उसे कहा जाता है जिसके प्रत्येक चरण में वर्णों का क्रम तथा वर्णों की संख्या नियत रहती है। जब लघु गुरु का क्रम और उनकी संख्या निश्चित है तो मात्रा स्वयंमेव सुनिश्चित है।

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मात्रिक छंद परिभाषा

मात्रिक छंद परिभाषा

मात्रिक छंद के पद में वर्णों की संख्या और वर्णों का क्रम निर्धारित नहीं रहता है परंतु मात्रा की संख्या निर्धारित रहती है। हिन्दी में वर्णिक छंदों की अपेक्षा मात्रिक छंदों का प्रचलन अधिक है। मात्रिक छंदों की लय भी बहुत मधुर तथा लोचदार होती है।

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गोपी छन्द ‘बनाकर लक्ष्य बढ़ो आगे’

गोपी छंद विधान-
यह मापनी आधारित प्रत्येक चरण पंद्रह मात्राओं का मात्रिक छन्द है।
आदि में त्रिकल (21 या 12),अंत में गुरु/वाचिक(२२ श्रेष्ठ)अनिवार्य है।
इसका वाचिक भार निम्न है-
3(21,12)2 2222 2(s) -15 मात्राएँ।

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असबंधा छंद

असबंधा छंद विधान:

“मातानासागाग” रचित ‘असबंधा’ है।
ये तो प्यारी छंद सरस मधु गंधा है।।

“मातानासागाग” = मगण, तगण, नगण, सगण गुरु गुरु
222  221  111  112  22= 14 वर्ण
दो दो या चारों चरण समतुकांत।

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चित्रपदा छन्द “गुरु वंदना”

चित्रपदा छन्द विधान-

211 211 2 2 = भगण, भगण, गुरु, गुरु
कुल 8 वर्ण की वर्णिक छंद।

चार चरण, दो-दो समतुकांत या चारो समतुकांत।

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32 मात्रिक छंद

32 मात्रिक छंद :

जाग उठो हे वीर जवानों, तुमने अब तक बहुत सहा है।
त्यज दो आज नींद ये गहरी, देश तुम्हें ये बुला रहा है।।
छोड़ो आलस का अब आँचल, अरि-ऐंठन का कर दो मर्दन।
टूटो मृग झुंडों के ऊपर, गर्जन करते केहरि सम बन।।1।।

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इन्द्रवज्रा छंद

इन्द्रवज्रा छंद विधान:

“ताता जगेगा” यदि सूत्र राचो।
तो ‘इन्द्रवज्रा’ शुभ छंद पाओ।

“ताता जगेगा” = तगण, तगण, जगण, गुरु, गुरु
221 221 121 22
**************
उपेन्द्रवज्रा छंद विधान:

“जता जगेगा” यदि सूत्र राचो।
‘उपेन्द्रवज्रा’ तब छंद पाओ।

“जता जगेगा” = जगण, तगण, जगण, गुरु, गुरु
121 221 121 22
**************
उपजाति छंद विधान:

उपेंद्रवज्रा अरु इंद्रवज्रा।
दोनों मिले तो ‘उपजाति’ छंदा।।

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अनुष्टुप छंद

अनुष्टुप छंद विधान:

यह छंद अर्धसमवृत्त है । इस के प्रत्येक चरण में आठ वर्ण होते हैं । पहले चार वर्ण किसी भी मात्रा के हो सकते हैं । पाँचवाँ लघु और छठा वर्ण सदैव गुरु होता है । सम चरणों में सातवाँ वर्ण ह्रस्व और विषम चरणों में गुरु होता है। आठवाँ वर्ण संस्कृत में तो लघु या गुरु कुछ भी हो सकता है। संस्कृत में छंद के चरण का अंतिम वर्ण लघु होते हुये भी दीर्घ उच्चरित होता है जबकि हिन्दी में यह सुविधा नहीं है। अतः हिन्दी में आठवाँ वर्ण सदैव दीर्घ ही होता है।

गुरु की गरिमा भारी, उसे नहीं बिगाड़ना।
हरती विपदा सारी, हितकारी प्रताड़ना।।

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मानव छंद “नारी की व्यथा”

मानव छंद विधान:

मानव छंद 14 मात्रिक चार चरणों का सम मात्रिक छंद है। तुक दो दो चरण की मिलाई जाती है। 14 मात्रा की बाँट 12 2 है। 12 मात्रा में तीन चौकल हो सकते हैं, एक अठकल एक चौकल हो सकता है या एक चौकल एक अठकल हो सकता है।

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त्रिभंगी छंद “भारत की धरती”

त्रिभंगी छंद विधान –

त्रिभंगी प्रति पद 32 मात्राओं का सम पद मात्रिक छंद है। प्रत्येक पद में 10, 8, 8, 6 मात्राओं पर यति होती है। यह 4 पद का छंद है। प्रथम व द्वितीय यति समतुकांत होनी आवश्यक है। परन्तु अभ्यांतर समतुकांतता यदि तीनों यति में निभाई जाय तो सर्वश्रेष्ठ है।

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विधाता छंद

विधाता छंद विधान:

विधाता छंद 28 मात्रा प्रति पद का सम पद मात्रिक छन्द है जो 14 – 14 मात्रा के दो यति खंडों में विभक्त रहता है।

संरचना के आधार पर विधाता छंद निश्चित वर्ण विन्यास पर आधारित मापनी युक्त छंद है। जिसकी मापनी 1222*4 है। इसमें गुरु (2) को दो लघु (11) में तोड़ा जा सकता है जो सदैव एक ही शब्द में साथ साथ रहने चाहिए।

यह छंद वाचिक स्वरूप में अधिक प्रसिद्ध है जिसमें उच्चारण के आधार पर काफी लोच संभव है। वाचिक स्वरूप में यति के भी कोई रूढ नियम नहीं है और उच्चारण अनुसार गुरु वर्ण को लघु मानने की भी छूट है।

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दुर्मिल सवैया “शारदा वंदन”

दुर्मिल सवैया विधान:

यह 24 वर्ण प्रति चरण का एक सम वर्ण वृत्त है। अन्य सभी सवैया छंदों की तरह इसकी रचना भी चार चरण में होती है और सभी चारों चरण एक ही तुकांतता के होने आवश्यक हैं।

यह सवैया सगण (112) पर आश्रित है, जिसकी 8 आवृत्ति प्रति चरण में रहती है। इसकी संरचना लघु लघु गूरु × 8 है।

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