संयुत छंद
संयुत छंद विधान:-
“सजजाग” ये दश वर्ण दो।
तब छंद ‘संयुत’ स्वाद लो।।
“सजजाग” = सगण जगण जगण गुरु
112 121 121 2 = 10 वर्ण।
संयुत छंद विधान:-
“सजजाग” ये दश वर्ण दो।
तब छंद ‘संयुत’ स्वाद लो।।
“सजजाग” = सगण जगण जगण गुरु
112 121 121 2 = 10 वर्ण।
दोही छंद विधान-
दोहे के पद के प्रारंभ में द्विकल जोड़ देने से दोही छंद बन जाता है, बाकी सब कुछ दोहे वाला ही विधान रहता है।
प्रदीप छंद विधान-
यह प्रति पद 29 मात्राओं का सम मात्रिक छंद है जो 16,13 मात्राओं के दो यति खण्डों में विभाजित रहता है।
दो दो पद या चारों पद समतुकांत होते हैं।
विमलजला छंद विधान:-
“सनलाग” वरण ला।
रचलें ‘विमलजला’।।
“सनलाग” = सगण नगण लघु गुरु
सिंह विलोकित छन्द विधान
मात्रा सोलह ही रखें,चरण चार तुकबंद।
दुक्कल अठकल अरु त्रिकल,लघु-गुरु रखलो अंत।।
सम मात्रिक यह छन्द है,बस इतना लो जान।
सिंह विलोकित छन्द का,रट लो आप विधान।।
वरूथिनी छंद विधान:-
“जनाभसन,जगा” वरण, सुछंद रच, प्रमोदिनी।
विराम सर,-त्रयी सजत, व चार पर, ‘वरूथिनी’।।
“जनाभसन,जगा” = जगण+नगण+भगण+सगण+नगण+जगण+गुरु
जयदयालजी गोयन्दका
देवपुरुष जीवन गाथा से,प्रेरित जग को करना है,
संतों की अमृत वाणी को,अंतर्मन में भरना है।
है सौभाग्य मेरा कुछ लिखकर,कार्य करूँ जन हितकारी,
शत-शत नमन आपको मेरा,राह दिखायी सुखकारी।१।
लावणी छंद विधान
लावणी छंद सम मात्रिक छंद है। इस छंद में चार पद होते हैं, जिनमें प्रति पद 30 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक पद दो चरण में बंटा हुआ रहता है जिनकी यति 16-14 पर निर्धारित होती है।
32 मात्रिक छंद विधान
यह चार पदों का सम मात्रिक छंद है जो ठीक चौपाई का ही द्विगुणित रूप है। इन 32 मात्रा में 16, 16 मात्रा पर यति होती है तथा दो दो पदों में पदान्त तुक मिलाई जाती है।
मंजुभाषिणी छंद विधान:-
“सजसाजगा” रचत ‘मंजुभाषिणी’।
यह छंद है अमिय-धार वर्षिणी।।
“सजसाजगा” = सगण जगण सगण जगण गुरु
मधुर ध्वनि छन्द / अमृत ध्वनि छंद ‘विधान’-
यह 24 मात्राओं का मात्रिक छन्द है।
क्रमशः 8,8,8 पर यति आवश्यक है।
चार पदों के इस छन्द में दो या चारों पद समतुकांत होने चाहिए। अन्तर्यति तुकांतता से छंद का माधुर्य बढ़ जाता है,वैसे यह आवश्यक नहीं है।
मधुर ध्वनि छंद के चार पदों के प्रारंभ में एक दोहा जोड़ देने से कुण्डलिया छंद की तर्ज का एक नया छंद बन जाता है जो “अमृत ध्वनि” के नाम से प्रसिद्ध है।
पावन छंद विधान:-
“भानजुजस” वरणी, यति आठ सपते।
‘पावन’ यह मधुरा, सब छंद जपते।।
“भानजुजस” = भगण नगण जगण जगण सगण
यति आठ सपते = यति आठ और सात वर्ण पे।
द्रुतविलम्बित छंद विधान :-
“नभभरा” इन द्वादश वर्ण में।
‘द्रुतविलम्बित’ दे धुन कर्ण में।।
नभभरा = नगण, भगण, भगण और रगण।(12 वर्ण)
111 211 211 212
दो दो चरण समतुकांत।
विष्णुपद छन्द विधान-
विष्णुपद छन्द सम मात्रिक छन्द है। यह 26 मात्राओं का छन्द है जिसमें 16,10 मात्राओं पर यति आवश्यक है।अंत में वाचिक भार 2 यानि गुरु का होना अनिवार्य है।कुल चार चरण होते हैं क्रमागत दो-दो या चारों चरण समतुकांत होने चाहिये।
आल्हा छंद या वीर छंद
“आलस्य”
कल पे काम कभी मत छोड़ो, आता नहीं कभी वह काल।
आगे कभी नहीं बढ़ पाते, देते रोज काम जो टाल।।
किले बनाते रोज हवाई, व्यर्थ सोच में हो कर लीन।
मोल समय का नहिं पहचाने, महा आलसी प्राणी दीन।।
आल्हा छंद या वीर छंद
“विधान”
आल्हा छंद या वीर छंद 31 मात्रा प्रति पद का सम पद मात्रिक छंद है। यह चार पदों में रचा जाता है। इसे मात्रिक सवैया भी कहते हैं। इसमें यति16 और 15 मात्रा पर नियत होती है। दो दो या चारों पद समतुकांत होने चाहिए।
मनहरण घनाक्षरी, ‘कविकुल’ कविकुल निखरा है, काव्य-रस बिखरा है, रसपान करने को, कविगण आइये। प्रेम का ये अनुबंध, अतिप्रिय है सम्बंध, भावों से पिरोये छन्द, मंत्रमुग्ध गाईये। काव्य कुंज ये है प्यारा, भरे मन उजियारा,
मनहरण घनाक्षरी
“भारत महिमा”
उत्तर बिराज कर, गिरिराज रखे लाज,
तुंग श्रृंग रजत सा, मुकुट सजात है।
मनहरण घनाक्षरी विधान :-
मनहरण को घनाक्षरी छंदों का सिरमौर कहें तो अनुचित नहीं होगा। चार पदों के इस छन्द में प्रत्येक पद में कुल वर्ण संख्या 31 होती है। घनाक्षरी एक वर्णिक छंद है अतः वर्णों की संख्या 31 वर्ण से न्यूनाधिक नहीं हो सकती। चारों पदों में समतुकांतता होनी आवश्यक है। 31 वर्ण लंबे पद में 16, 15 पर यति रखना अनिवार्य है। पदान्त हमेशा दीर्घ वर्ण ही रहता है।

घनाक्षरी विवेचन
घनाक्षरी वर्णिक छंद है जिसमें 30 से लेकर 33 तक वर्ण होते हैं परंतु अन्य वर्णिक छन्दों की तरह इसमें गणों का नियत क्रम नहीं है। यह कवित्त के नाम से भी प्रसिद्ध है। घनाक्षरी गणों के और मात्राओं के बंधन में बंधा हुआ छंद नहीं है परंतु इसके उपरांत भी बहुत ही लय युक्त मधुर छंद है और यह लय कुछेक नियमों के अनुपालन से ही सधती है।

नाम– बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’
निवास स्थान – तिनसुकिया (असम)
रुचि – काव्य की हर विधा में सृजन करना। हिन्दी साहित्य की हर प्रचलित छंद, गीत, नवगीत, हाइकु, सेदोका, वर्ण पिरामिड, गज़ल, मुक्तक, सवैया, घनाक्षरी इत्यादि। हिंदी साहित्य की पारंपरिक छंदों में विशेष रुचि है और मात्रिक एवं वर्णिक लगभग सभी प्रचलित छंदों में काव्य सृजन में सतत संलग्न।
सम्मान– मेरी रचनाएँ देश की सम्मानित वेब पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहती हैं। हिंदी साहित्य से जुड़े विभिन्न ग्रूप और संस्थानों से कई अलंकरण और प्रसस्ति पत्र नियमित प्राप्त होते रहते हैं।